प्रभु यीशु ने कहा, “आधी रात को धूम मची: ‘देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो’” (मत्ती 25:6)। “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ” (प्रकाशितवाक्य 3:20)। स्पष्ट है कि अंत के दिनों में प्रभु हमारे दरवाज़ों पर दस्तक देने के लिए वचन बोलेंगे। बुद्धिमान कुंवारियां परमेश्वर की वाणी सुनेंगी और प्रभु के आगमन का स्वागत करेंगी और मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करेंगी। उन्हें परमेश्वर के सिंहासन के समक्ष स्वर्गारोहित किया जाएगा और वे मेमने के विवाह भोज में हिस्सा लेंगी।
बुद्धिमान कुंवारियां परमेश्वर की वाणी सुन सकती हैं और प्रभु का स्वागत कर सकती हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन
चूँकि हम परमेश्वर के पदचिह्नों की खोज कर रहे हैं, इसलिए यह हमें परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के वचनों, उसके कथनों को तलाशने के योग्य बनाता है—क्योंकि जहाँ कहीं भी परमेश्वर के द्वारा बोले गए नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है और जहाँ कहीं भी परमेश्वर के पदचिह्न हैं, वहाँ परमेश्वर के कर्म हैं। जहाँ कहीं भी परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर प्रकट होता है, और जहाँ कहीं भी परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य, मार्ग और जीवन विद्यमान होता है। परमेश्वर के पदचिह्नों की तलाश में, तुम लोगों ने उन वचनों की उपेक्षा कर दी है कि “परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है।” और इसलिए, बहुत से लोग, सत्य को प्राप्त करके भी यह नहीं मानते हैं कि उन्हें परमेश्वर के पदचिह्न मिल गए हैं, और वे परमेश्वर के प्रकटन को तो और भी कम स्वीकार करते हैं। कितनी गंभीर ग़लती है! परमेश्वर के प्रकटन का मनुष्य की धारणाओं के साथ समन्वय नहीं किया जा सकता है, परमेश्वर मनुष्य के आदेश पर तो बिल्कुल प्रकट नहीं हो सकता। परमेश्वर जब अपना कार्य करता है, तो वह अपनी पसंद और अपनी योजनाएँ बनाता है; इसके अलावा, उसके अपने उद्देश्य और अपने तरीके हैं। वह जो भी कार्य करता है, उसे उसके बारे में मनुष्य से चर्चा करने या उसकी सलाह लेने की आवश्यकता नहीं है, वह अपने कार्य के बारे में किसी भी व्यक्ति को सूचित तो बिल्कुल नहीं करता। परमेश्वर के इस स्वभाव को हर व्यक्ति को पहचानना चाहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के प्रकटन को देखने, परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करने की इच्छा रखते हो, तो तुम लोगों को सबसे पहले अपनी धारणाओं को त्याग देना चाहिए। तुम लोगों को यह माँग करनी ही नहीं चाहिए कि परमेश्वर ऐसा या वैसा करे, तुम्हें उसे अपनी सीमाओं और अपनी अवधारणाओं तक सीमित नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, तुम्हें पूछना चाहिए कि तुम लोगों को परमेश्वर के पदचिह्नों की तलाश कैसे करनी है, तुम्हें परमेश्वर के प्रकटन को कैसे स्वीकार करना है, और तुम्हें परमेश्वर के नए कार्य के प्रति कैसे समर्पण करना है; मनुष्य को ऐसा ही करना चाहिए। चूँकि मनुष्य सत्य नहीं है, और सत्य को धारण नहीं करता है, इसलिए उसे खोजना, स्वीकार करना, और आज्ञापालन करना चाहिए।
— “परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है” से उद्धृत
पवित्र आत्मा का कार्य दिन ब दिन बदलता जाता है, हर एक कदम के साथ ऊँचा उठता जाता है; आने वाले कल का प्रकाशन आज से भी कहीं ज़्यादा ऊँचा होता है, कदम दर कदम और ऊपर चढ़ता जाता है। जिस कार्य के द्वारा परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध करता है वह ऐसा ही है। यदि मनुष्य उस गति से चल न पाए, तो उसे किसी भी समय पीछे छोड़ा जा सकता है। यदि मनुष्य के पास आज्ञाकारी हृदय न हो, तो वह अंत तक अनुसरण नहीं कर सकता है। पूर्व का युग गुज़र गया है; यह एक नया युग है। और नए युग में, नया कार्य करना होगा। विशेषकर अंतिम युग में जिसमें मनुष्य को सिद्ध किया जाएगा, परमेश्वर पहले से ज़्यादा तेजी से नया कार्य करेगा। इसलिए, अपने हृदय में आज्ञाकारिता को धारण किए बिना, मनुष्य के लिए परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करना कठिन होगा। परमेश्वर किसी भी नियम का पालन नहीं करता है, न ही वह अपने कार्य के किसी स्तर को अपरिवर्तनीय मानता है। बल्कि, वह जिस कार्य को करता है वह हमेशा नया और हमेशा ऊँचा होता है। उसका कार्य हर एक कदम के साथ और भी अधिक व्यावहारिक होता जाता है, और मनुष्य की वास्तविक ज़रूरतों के और भी अधिक अनुरूप होता जाता है। जब मनुष्य इस प्रकार के कार्य का अनुभव करता है केवल तभी वह अपने स्वभाव के अंतिम रूपान्तरण को हासिल कर पाता है। जीवन के बारे में मनुष्य का ज्ञान और सर्वाधिक उच्च स्तरों तक पहुँच जाता है, इसलिए इसी तरह से परमेश्वर का कार्य भी सर्वाधिक उच्च स्तरों तक पहुँच जाता है। केवल इसी तरह से मनुष्य को सिद्ध बनाया जा सकता है और वह परमेश्वर के उपयोग के योग्य हो सकता है। परमेश्वर एक ओर, मनुष्य की अवधारणाओं का सामना करने और उन्हें उलटने के लिए, और दूसरी ओर, उच्चतर तथा और अधिक वास्तविक स्थिति में, परमेश्वर पर विश्वास करने के उच्चतम आयाम में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए, इस तरह से कार्य करता है, ताकि अंत में, परमेश्वर की इच्छा पूरी हो सके। वे सभी जो अवज्ञाकारी प्रकृति के हैं जो जानबूझ कर विरोध करते हैं उन्हें परमेश्वर के द्रुतगामी और प्रचंडता से आगे बढ़ते हुए कार्य के इस चरण द्वारा पीछे छोड़ दिया जाएगा; केवल जो स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं और जो अपने आप को प्रसन्नतापूर्वक दीन बनाते हैं वे ही मार्ग के अंत तक प्रगति कर सकते हैं। इस प्रकार के कार्य में, तुम सभी लोगों को सीखना चाहिए कि समर्पण कैसे करें और अपनी अवधारणाओं को कैसे अलग रखें। तुम लोगों को उस हर कदम पर सतर्क रहना चाहिए जो तुम उठाते हो। यदि तुम लोग लापरवाह हो, तो तुम लोग निश्चित रूप से उनमें से एक बन जाओगे जिसे पवित्र आत्मा द्वारा ठुकराया जाता है, और एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के कार्य में उसे बाधित करता है।
— “जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे” से उद्धृत
वे सभी धन्य हैं जो पवित्र आत्मा की वर्तमान उक्तियों का पालन करने में सक्षम हैं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कैसे थे, या उनके भीतर पवित्र आत्मा कैसे कार्य किया करता था—जिन्होंने नवीनतम कार्य को प्राप्त किया है वे सबसे अधिक धन्य हैं, और जो लोग आज के नवीनतम कार्य का अनुसरण नहीं कर सकते हैं, वे हटा दिए जाते हैं। परमेश्वर उन्हें चाहता है जो नई रोशनी को स्वीकार करने में सक्षम हैं, और वह उन्हें चाहता है जो उसके नवीनतम कार्य को स्वीकार करते और जान लेते हैं। ऐसा क्यों कहा गया है कि तुम लोगों को शुद्ध कुँवारी होना चाहिए? एक शुद्ध कुँवारी पवित्र आत्मा के कार्य की तलाश करने में और नई चीज़ों को समझने में सक्षम होती है, और इसके अलावा, पुरानी अवधारणाओं को दूर करने और परमेश्वर के आज के कार्य का अनुसरण करने में सक्षम होती है। इस समूह के लोगों को, जो आज के नवीनतम कार्य को स्वीकार करते हैं, परमेश्वर ने युगों पहले ही पूर्वनिर्धारित किया था, और वे सभी लोगों में सबसे अधिक धन्य हैं। तुम लोग सीधे परमेश्वर की आवाज सुनते हो, और परमेश्वर की उपस्थिति का दर्शन करते हो, और इस तरह, समस्त स्वर्ग और पृथ्वी में, और सारे युगों में, कोई भी तुम सब से, लोगों के इस समूह से, अधिक धन्य नहीं है।
— “परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके चरण-चिन्हों का अनुसरण करो” से उद्धृत
चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, तो उसे परमेश्वर के पदचिह्नों का, कदम दर कदम, करीब से अवश्य अनुसरण करना चाहिए; और उसे “जहाँ कहीं मेम्ना जाता है उसका अनुसरण करना” चाहिए। केवल ये ही ऐसे लोग हैं जो सच्चे मार्ग को खोजते हैं, केवल ये ही ऐसे लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। जो लोग पत्रों और सिद्धान्तों का ज्यों का त्यों अनुसरण करते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा निष्कासित कर दिया गया है। प्रत्येक समयावधि में, परमेश्वर नया कार्य आरम्भ करेगा, और प्रत्येक अवधि में, मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल सच्चाईयों का ही पालन करता है कि “यहोवा ही परमेश्वर है” और “यीशु ही मसीह है,” जो ऐसी सच्चाईयाँ हैं जो केवल एक अकेले युग पर ही लागू होती हैं, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा, और वह हमेशा पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने में अक्षम रहेगा। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, मनुष्य जरा से भी सन्देह के बिना अनुसरण करता है, और वह करीब से अनुसरण करता है। इस तरह, पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य को कैसे निष्कासित किया जा सकता है? इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, जब तक मनुष्य को निश्चय है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और वह बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दण्ड दिया जा सकता है?
— “परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास” से उद्धृत
परमेश्वर संपूर्ण मानव जाति का परमेश्वर है। वह स्वयं को किसी भी राष्ट्र या लोगों की निजी संपत्ति नहीं मानता है, बल्कि जैसी उसने योजना बनायी है उसके अनुसार वह, किसी भी रूप, राष्ट्र या लोगों द्वारा विवश हुए बिना, कार्य को करता जाता है। शायद तुमने इस रूप की कभी कल्पना भी न की हो, या शायद इस रूप के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण इनकार करने वाला हो, या शायद वह देश जहाँ परमेश्वर स्वयं को प्रकट करता है और जिन लोगों के बीच वह स्वयं को प्रकट करता है, वे सब ऐसे हों जिनके साथ सभी के द्वारा भेदभाव किया जाता हो और वे सब ऐसे हों जो पृथ्वी पर सर्वाधिक पिछड़े हुए हों। फिर भी परमेश्वर के पास अपनी बुद्धि है। अपनी महान सामर्थ्य के साथ, और अपने सत्य और स्वभाव के माध्यम से, उसने वास्तव में ऐसे लोगों के समूह को प्राप्त कर लिया है जो उसके साथ एक मन वाले हैं, ऐसे लोगों का समूह जिसे वह पूर्ण बनाने की कामना करता है—उसके द्वारा विजित समूह, जो सभी प्रकार के परीक्षणों, क्लेशों और उत्पीड़न को सहन करके, अंत तक उसका अनुसरण कर सकता है। किसी भी रूप या राष्ट्र की विवशताओं से मुक्त, परमेश्वर के प्रकटन का लक्ष्य, उसे अपने द्वारा बनाई गई योजना के अनुसार कार्य को पूरा करने में सक्षम बनाना है। यह वैसा ही है जैसे जब परमेश्वर यहूदिया में देह बना, तब उसका लक्ष्य समस्त मानव जाति को छुड़ाने के लिये सलीब पर चढ़ने के कार्य को पूरा करना था। फिर भी यहूदियों का मानना था कि परमेश्वर के लिए ऐसा करना असंभव है, और उन्हें यह असंभव लगता था कि परमेश्वर देह बन सकता है और प्रभु यीशु के रूप को ग्रहण कर सकता है। उनका “असंभव” वह आधार बन गया जिस पर उन्होंने परमेश्वर की निंदा और उसका विरोध किया, और अंततः इस्राएल को विनाश की ओर ले गया। आज, कई लोगों ने उसी तरह की ग़लती की है। वे अपनी समस्त शक्ति के साथ परमेश्वर के आसन्न प्रकटन की घोषणा करते हैं, मगर साथ ही उसके प्रकटन की निंदा भी करते हैं; उनका “असंभव” परमेश्वर के प्रकटन को एक बार और उनकी कल्पना की सीमा के भीतर सीमित कर देता है। और इसलिए मैंने कई लोगों को परमेश्वर के वचनों के आने के बाद जँगली और कर्कश हँसी का ठहाका लगाते देखा है। लेकिन क्या यह हँसी यहूदियों की निंदा और ईशनिंदा से किसी तरह से भिन्न है? सच्चाई की उपस्थिति तुम लोगों को श्रद्धावान नहीं बनाती, सच्चाई के लिए तरसने की तुम लोगों की प्रवृत्ति तो और भी कम है। तुम बस इतना ही करते हो कि लापरवाही से छानबीन करते हो और बेपरवाह जिंदादिली के साथ प्रतीक्षा करते हो। इस तरह से छानबीन और प्रतीक्षा करने से तुम्हें क्या फायदा हो सकता है? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम परमेश्वर का व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त करोगे? यदि तुम परमेश्वर के कथनों को नहीं समझ सकते, तो तुम किस तरह से परमेश्वर के प्रकटन को देखने के योग्य हो? जहाँ कहीं भी परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य व्यक्त होता है, और वहाँ परमेश्वर की वाणी होगी। केवल वे लोग ही परमेश्वर की वाणी को सुन पाएँगे जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, और केवल इस तरह के लोग ही परमेश्वर के प्रकटन को देखने के योग्य हैं। अपनी धारणाओं को एक ओर रख दो! शांत हो जाओ और इन शब्दों को सावधानीपूर्वक पढ़ो। यदि तुम सच्चाई के लिए तरसते हो, तो परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम उसकी इच्छा और उसके वचनों को समझोगे। “असंभव” के बारे में तुम लोग अपनी राय को अलग रखो! लोग जितना अधिक मानते हैं कि कुछ असंभव है, उतना ही अधिक होने की संभावना होती है, क्योंकि परमेश्वर की बुद्धि स्वर्ग से ऊँची उड़ान भरती है, परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों से ऊँचे हैं, और परमेश्वर का कार्य मनुष्य की सोच और धारणा की सीमाओं से परे जाता है। जितना अधिक कुछ असंभव होता है, उतना ही अधिक उसमें सच्चाई होती है जिसे खोजा जा सकता है; कोई चीज़ मनुष्य की धारणा और कल्पना से जितनी अधिक परे रहती है, उसमें परमेश्वर की इच्छा उतनी ही अधिक होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही वह स्वयं को कहीं भी प्रकट क्यों न करता हो, परमेश्वर तब भी परमेश्वर है, और उसके प्रकटन के स्थान या तरीके की वजह से उसका सार कभी नहीं बदलेगा। परमेश्वर के पदचिह्न चाहे कहीं भी हों उसका स्वभाव वैसा ही बना रहता है, और चाहे परमेश्वर के पदचिह्न कहीं भी क्यों न हों, वह समस्त मनुष्यजाति का परमेश्वर है, ठीक वैसे ही जैसे कि प्रभु यीशु न केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, बल्कि वह एशिया, यूरोप और अमेरिका के सभी लोगों का, और इससे भी अधिक समस्त ब्रह्मांड का एकमात्र परमेश्वर है। तो आइए हम परमेश्वर की इच्छा की खोज करें और उसके कथनों में उसके प्रकटन की खोज करें, और उसके पदचिह्नों के साथ तालमेल रखें! परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है। उसके वचन और उसका प्रकटन समकालिक रूप से विद्यमान रहते हैं, उसका स्वभाव और पदचिह्न मनुष्यजाति के लिए हर समय खुले हैं। प्यारे भाइयो और बहनो, मुझे आशा है कि इन वचनों में तुम लोग परमेश्वर के रूप को देख सकते हो, और यह कि तुम उसके पदचिह्नों का अनुसरण करना शुरू कर सकते हो जब तुम एक नए युग में आगे बढ़ते हो, और उस सुंदर नए स्वर्ग और पृथ्वी में प्रवेश करते हो जिसे परमेश्वर ने उन लोगों के लिए तैयार किया है जो उसके प्रकटन का इंतजार करते हैं!
— “परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है” से उद्धृत
परमेश्वर की वाणी कैसे सुनें
संदर्भ के लिए बाइबल के पद
“मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)।
“देख, यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है, उस पुस्तक को खोलने और उसकी सातों मुहरें तोड़ने के लिये जयवन्त हुआ है” (प्रकाशितवाक्य 5:5)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन
जो देहधारी परमेश्वर है, वह परमेश्वर का सार धारण करेगा, और जो देहधारी परमेश्वर है, वह परमेश्वर की अभिव्यक्ति धारण करेगा। चूँकि परमेश्वर देहधारी हुआ, वह उस कार्य को प्रकट करेगा जो उसे अवश्य करना चाहिए, और चूँकि परमेश्वर ने देह धारण किया, तो वह उसे अभिव्यक्त करेगा जो वह है, और मनुष्यों के लिए सत्य को लाने में समर्थ होगा, मनुष्यों को जीवन प्रदान करने, और मनुष्य को मार्ग दिखाने में सक्षम होगा। जिस शरीर में परमेश्वर का सार नहीं है, निश्चित रूप से वह देहधारी परमेश्वर नहीं है; इस बारे में कोई संदेह नहीं है। यह पता लगाने के लिए कि क्या यह देहधारी परमेश्वर है, मनुष्य को इसका निर्धारण उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव से और उसके द्वारा बोले वचनों से अवश्य करना चाहिए। कहने का अभिप्राय है कि वह परमेश्वर का देहधारी शरीर है या नहीं, और यह सही मार्ग है या नहीं, इसे परमेश्वर के सार से तय करना चाहिए। और इसलिए, यह निर्धारित करने[क] में कि यह देहधारी परमेश्वर का शरीर है या नहीं, बाहरी रूप-रंग के बजाय, उसके सार (उसका कार्य, उसके वचन, उसका स्वभाव और बहुत सी अन्य बातें) पर ध्यान देना ही कुंजी है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी रूप-रंग को ही देखता है, उसके तत्व की अनदेखी करता है, तो यह मनुष्य की अज्ञानता और उसके अनाड़ीपन को दर्शाता है।
— “केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है” से उद्धृत
चाहे परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन, बाहरी स्वरूप में केवल कोरे या अगाध हों, वे सभी सत्य हैं। जैसे ही कोई मनुष्य जीवन में प्रवेश करता है, तो ये सभी सत्य उसके लिए अपरिहार्य बन जाते हैं; ये जीवन के जल के ऐसे सोते हैं जो उसे आत्मा और शरीर दोनों में जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्य को जीवित रहने के लिए हर ज़रूरी चीज़, उसके प्रतिदिन का जीवन जीने के लिए सिद्धांत और मत, उद्धार पाने के लिए मार्ग, लक्ष्य और दिशा जिससे होकर उसे गुज़रना आवश्यक है; हर वह सत्य जो एक सृजित प्राणी के रूप में उसके पास होना ज़रूरी है; तथा मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाकारिता और आराधना कैसे करे, ऐसे सभी सत्य प्रदान करते हैं। वे ऐसे आश्वासन हैं जो मनुष्य का जीवित रहना सुनिश्चित करते हैं, वे मनुष्य का दैनिक आहार हैं और वे ऐसे प्रबल समर्थक हैं जो मनुष्य को दृढ़ और स्थिर करते हैं। सृजित मनुष्य जिस प्रकार जीवन जीता है, उसमें वे सामान्य मानवता के सत्य की वास्तविकता में बहुत ही गहरे हैं, और वे सृजनकार द्वारा सृजित मनुष्य को दिए जाने वाले ऐसे सत्य हैं जिसके माध्यम से मानवजाति भ्रष्टाचार से और शैतान के जाल से बच जाती है, साथ ही, वे अथक शिक्षा, उपदेश, प्रोत्साहन और सांत्वना से संपन्न हैं। वे ऐसे प्रकाश-पुंज हैं जो मनुष्य को सभी सकारात्मक बातों के लिए मार्गदर्शन और प्रबुद्धता देते हैं, वे ऐसे आश्वासन हैं जो यह सुनिश्चित करते हैं कि मनुष्य, वह सब कुछ जो न्यायसंगत और अच्छा है, जिन मापदंडों पर लोगों, घटनाओं और वस्तुओं, सभी को मापा जाता है, तथा ऐसे सभी दिशानिर्देशों को जिये और उनकी प्राप्ति करे जो मनुष्य को उद्धार और प्रकाश के मार्ग की ओर ले जाते हैं। परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों के आधार पर ही मनुष्य को सत्य और जीवन प्रदान किया जाता है; केवल इस में ही वह यह समझ पाता है कि सामान्य मानवता क्या है, एक सार्थक जीवन क्या है, एक वास्तविक सृजित प्राणी क्या है, परमेश्वर के प्रति वास्तविक आज्ञापालन क्या है; केवल इसी में वह यह समझ पाता है कि उसे किस प्रकार से परमेश्वर की परवाह करनी चाहिए, एक सृजित प्राणी की ज़िम्मेदारी कैसे पूर्ण करनी चाहिए, और एक वास्तविक मनुष्य के समान गुणों को कैसे प्राप्त करना चाहिए; केवल यहीं वह यह समझ पाता है कि सच्ची आस्था और सच्ची आराधना क्या है; केवल यहीं वह यह समझ पाता है कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों का शासक कौन है; केवल यहीं वह इस बात को समझ पाता है कि जो सारे सृजन का अधिपति है, किन साधनों से वह समस्त रचना पर शासन करता, उसकी अगुवाई करता और सृष्टि का पोषण करता है; और केवल यहीं वह उन साधनों को ग्रहण कर पाता और समझ पाता है जिनके ज़रिये सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी अस्तित्व में रहता, स्वयं को व्यक्त करता और कार्य करता है…। परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों से अलग, परमेश्वर के वचनों और सत्य के विषय में मनुष्य के पास कोई भी वास्तविक ज्ञान या अंतदृष्टि नहीं होती। ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से एक जीवित लाश, बिल्कुल एक घोंघे के समान होता है और सृजनकार से संबंधित किसी भी ज्ञान का उससे कोई वास्ता नहीं होता।
— “परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है” से उद्धृत
परमेश्वर के वचन को पढ़कर और समझकर कर परमेश्वर को जानना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं: “मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मैं परमेश्वर को कैसे जान सकता हूँ?” परमेश्वर का वचन वास्तव में परमेश्वर के स्वभाव की एक अभिव्यक्ति है। आप परमेश्वर के वचन से मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम और उनके उद्धार के साथ-साथ यह भी देख सकते हैं कि वे किस तरह से उन्हें बचाते हैं…। क्योंकि परमेश्वर का वचन, स्वयं परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया जाता है, उसे लिखने के लिए किसी मनुष्य का उपयोग नहीं किया जाता है। यह व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया जाता है। यह स्वयं परमेश्वर है जो अपने स्वयं के वचनों और अपने भीतर की आवाज़ को व्यक्त कर रहा है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि वे दिल से महसूस किए जाने वाले वचन हैं? क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उनकी इच्छा, उनके विचारों, मानवजाति के लिए उनके प्रेम, उनके द्वारा मानवजाति के उद्धार, तथा मानवजाति से उनकी अपेक्षाओं को व्यक्त कर रहे हैं। परमेश्वर के वचनों में कठोर वचन, शांत एवं कोमल वचन, कुछ विचारशील वचन हैं, और कुछ प्रकाशित करने वाले वचन भी हैं जो इंसान की इच्छाओं के अनुरूप नहीं हैं। यदि आप केवल प्रकाशित करने वाले वचनों को देखेंगे, तो आप महसूस करेंगे कि परमेश्वर काफी कठोर हैl यदि आप केवल शांत एवं कोमल वचन को देखेंगे, तो आप महसूस करेंगे कि परमेश्वर के पास ज़्यादा अधिकार नहीं हैl इसलिए इस विषय में आपको सन्दर्भ से बाहर होकर नहीं समझना चाहिए, आपको इसे हर एक कोण से देखना चाहिए। कभी-कभी परमेश्वर शांत एवं करुणामयी दृष्टिकोण से बोलता है, और लोग मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और लोग परमेश्वर के अपमान न सहन करने वाले स्वभाव को देखते हैं। मनुष्य बुरी तरह से गंदा है और परमेश्वर के मुख को देखने के योग्य नहीं है, और परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है। लोगों का परमेश्वर के सामने आना अब पूरी तरह परमेश्वर के अनुग्रह से ही संभव है। जिस तरह परमेश्वर कार्य करता है और उसके कार्य के अर्थ से परमेश्वर की बुद्धि को देखा जा सकता है। भले ही लोग परमेश्वर के सीधे सम्पर्क में न आएँ, तब भी वे परमेश्वर के वचनों में इन चीज़ों को देखने में सक्षम होंगे।
— “देहधारी परमेश्वर को कैसे जानें” से उद्धृत
इस बार, परमेश्वर कार्य करने आत्मिक देह में नहीं, बल्कि एकदम साधारण देह में आया है। यह न केवल परमेश्वर के दूसरी बार देहधारण की देह है, बल्कि यह वही देह है जिसमें वह लौटकर आया है। यह बिलकुल साधारण देह है। इस देह में दूसरों से अलग कुछ भी नहीं है, परंतु तुम उससे वह सत्य ग्रहण कर सकते हो जिसके विषय में तुमने पहले कभी नहीं सुना होगा। यह तुच्छ देह, परमेश्वर के सभी सत्य-वचन का मूर्त रूप है, जो अंत के दिनों में परमेश्वर का काम करती है, और मनुष्यों के जानने के लिये यही परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। क्या तुम परमेश्वर को स्वर्ग में देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम स्वर्ग में परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम मनुष्यजाति के गंतव्य को जानने या समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? वह तुम्हें वो सभी अकल्पनीय रहस्य बतायेगा, जो कभी कोई इंसान नहीं बता सका, और तुम्हें वो सत्य भी बतायेगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह परमेश्वर के राज्य में तुम्हारे लिये द्वार है, नये युग में तुम्हारा मार्गदर्शक है, ऐसा साधारण देह असीम, अथाह रहस्यों को समेटे हुये है। संभव है कि उसके कार्यों को तुम समझ न पाओ, परंतु उसके सभी कामों का लक्ष्य, तुम्हें इतना बताने के लिये पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा लोग मानते हैं। क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही साथ अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह को भी दर्शाता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गये उन वचनों को नहीं सुन सकते, जो आकाश और पृथ्वी को कंपाते से लगते हैं, या उसकी ज्वाला-सी धधकती आंखों को नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह दण्ड के अनुशासन का अनुभव नहीं कर सकते, तुम उसके वचनों में परमेश्वर के क्रोध को सुन सकते हो, और जान सकते हो कि परमेश्वर समस्त मानवजाति पर दया दिखाता है; तुम परमेश्वर के धार्मिकतायुक्त स्वभाव और उसकी बुद्धि को समझ सकते हो, और इसके अलावा, समस्त मानवजाति के लिये परमेश्वर की चिंता और परवाह को समझ सकते हो।
— “क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है” से उद्धृत
वह मनुष्य के सार से अच्छी तरह से अवगत है, वह सभी प्रकार के लोगों से सम्बन्धित सभी प्रकार के अभ्यासों को प्रकट कर सकता है। वह मानव के भ्रष्ट स्वभाव और विद्रोही व्यवहार को भी बेहतर ढंग से प्रकट करता है। वह सांसारिक लोगों के बीच नहीं रहता है, परन्तु वह नश्वरों की प्रकृति और सांसारिक लोगों की समस्त भ्रष्टता से अवगत है। यही वह है। यद्यपि वह संसार के साथ निपटता नहीं है, फिर भी वह संसार के साथ निपटने के नियमों को जानता है, क्योंकि वह मानवीय प्रकृति को पूरी तरह से समझता है। वह पवित्रात्मा के आज और अतीत दोनों के कार्य के बारे में जानता है जिसे मनुष्य की आँखें नहीं देख सकती हैं और जिसे मनुष्य के कान नहीं सुन सकते हैं। इसमें बुद्धि शामिल है जो कि जीवन का फ़लसफ़ा और आश्चर्य नहीं है जिसकी थाह पाना मनुष्य को कठिन जान पड़ता है। यही वह है, लोगों के लिए खुला और लोगों से छिपा हुआ भी। जो कुछ वह व्यक्त करता है वह ऐसा नहीं है जैसा एक असाधारण मनुष्य होता है, बल्कि पवित्रात्मा के अंतर्निहित गुण और अस्तित्व हैं। वह दुनिया भर में यात्रा नहीं करता है परन्तु उसकी हर चीज़ को जानता है। वह “वन-मानुषों” के साथ सम्पर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं होती है, परन्तु वह ऐसे वचनों को व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान मनुष्यों से ऊपर होते हैं। वह मंदबुद्धि और संवेदनशून्य लोगों के समूह के बीच रहता है जिनमें मानवता नहीं है और जो मानवीय परम्पराओं और जीवनों को नहीं समझते हैं, परन्तु वह मनुष्यजाति से सामान्य मानवता का जीवन जीने के लिए कह सकता है, साथ ही मनुष्यजाति की नीच और अधम मानवता को प्रकट करता है। यह सब कुछ वही है जो वह है, किसी भी माँस और लहू के व्यक्ति की अपेक्षा अधिक ऊँचा है। उसके लिए, यह अनावश्यक है कि वह उस कार्य को करने के लिए जिसे उसे करने की आवश्यकता है और भ्रष्ट मनुष्यजाति के सार को पूरी तरह से प्रकट करने के लिए जटिल, बोझिल और पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करे। पतित सामाजिक जीवन उसकी देह को शिक्षित नहीं करता है। उसके कार्य और वचन मनुष्य की अवज्ञा को ही प्रकट करते हैं और संसार के साथ निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव और सबक प्रदान नहीं करते हैं। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जाँच-पड़ताल करने की आवश्यकता नहीं होती है। मनुष्य को उजागर करना और उसका न्याय करना उसकी देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लम्बे समय तक मनुष्य की अवज्ञा को जानने के बाद मनुष्य की अधार्मिकता को प्रकट करने और मनुष्यजाति की भ्रष्टता से घृणा करने के लिए है। जिस कार्य को परमेश्वर करता है वह सब मनुष्य के सामने अपने स्वभाव को प्रकट करने और अपने अस्तित्व को व्यक्त करने के लिए है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है, यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे माँस और लहू का व्यक्ति प्राप्त कर सकता है।
— “परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य” से उद्धृत
यीशु का लौटना उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, परन्तु उनके लिए जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, यह निंदा का एक संकेत है। तुम लोगों को अपना स्वयं का रास्ता चुनना चाहिए, और पवित्र आत्मा के विरोध में तिरस्कार नहीं करना चाहिए और सत्य को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। तुम लोगों को अज्ञानी और अभिमानी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, बल्कि ऐसा बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करता हो और सत्य की खोज करने के लिए लालायित हो; सिर्फ़ इसी तरीके से तुम लोग लाभान्वित होगे। मैं तुम लोगों को परमेश्वर में विश्वास के रास्ते पर सावधानी से चलने की सलाह देता हूँ। निष्कर्ष तक न पहुँचें; इससे ज्यादा और क्या, परमेश्वर में अपने विश्वास में लापरवाह और निश्चिन्त न बनें। तुम लोगों को जानना चाहिए कि कम से कम, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उन्हें विनम्र और श्रद्धावान होना चाहिए। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी इस पर अपनी नाक-भौं सिकोड़ते हैं, वे मूर्ख और अज्ञानी हैं। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी लापरवाही के साथ निष्कर्षों तक पहुँचते हैं या उसकी निंदा करते हैं, ऐसे लोग अभिमान से घिरे हुए हैं। जो कोई भी यीशु पर विश्वास करता है वह दूसरों को श्राप देने या दूसरों की निंदा करने के योग्य नहीं है। तुम सब लोगों को एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो तर्कसंगत हो और सत्य को स्वीकार करता हो। शायद, सत्य के मार्ग को सुन कर और जीवन के वचन को पढ़ कर, तुम विश्वास करते हो कि इन 10,000 वचनों में से सिर्फ़ एक ही वचन है जो तुम्हारे दृढ़ विश्वास के अनुसार और बाइबल के समान है, और फिर तुम्हें उसमें इन वचनों में से 10,000वें वचन की खोज करते रहना चाहिए। मैं अब भी तुम्हें सुझाव देता हूँ कि विनम्र बनो, अति-आत्मविश्वासी न बनो, और अपने आप को बहुत ऊँचा न उठाओ। परमेश्वर के लिए अपने हृदय में इतना थोड़ा सा आदर रखकर, तुम बड़े प्रकाश को प्राप्त करोगे। यदि तुम इन वचनों की सावधानी से जाँच करो और इन पर बार-बार मनन करो, तब तुम समझोगे कि वे सत्य हैं या नहीं, वे जीवन हैं या नहीं। शायद, केवल कुछ वाक्यों को पढ़ कर, कुछ लोग इन वचनों की बिना देखे ही यह कहते हुए निंदा करेंगे, “यह पवित्र आत्मा की थोड़ी प्रबुद्धता से अधिक कुछ नहीं है,” अथवा “यह एक झूठा मसीह है जो लोगों को धोखा देने के लिए आया है।” जो लोग ऐसी बातें कहते हैं वे अज्ञानता से अंधे हो गए हैं! तुम परमेश्वर के कार्य और बुद्धि को बहुत कम समझते हो और मैं तुम्हें पुनः आरंभ से शुरू करने की सलाह देता हूँ! अंत के दिनों में झूठे मसीहों के प्रकट होने की वजह से परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गए वचनों की तुम लोगों को निंदा अवश्य नहीं करनी चाहिए, और क्योंकि तुम लोग धोखे से डरते हो, इसलिए तुम लोगों को ऐसा अवश्य नहीं बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के विरोध में तिरस्कार करे। क्या यह एक बड़ी दयनीय स्थिति नहीं होगी? यदि, बहुत जाँच के बाद, अब भी तुम्हें लगता है कि ये वचन सत्य नहीं हैं, मार्ग नहीं हैं, और परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हैं, तो फिर अंततः तुम दण्डित किए जाओगे, और आशीषों के बिना होगे। यदि तुम ऐसे सत्य को जो साफ़-साफ़ और स्पष्ट रूप से कहा गया है स्वीकार नहीं कर सकते हो, तो क्या तुम परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य नहीं हो? क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने के लिए पर्याप्त सौभाग्यशाली नहीं है? इस बारे में विचार करो! उतावले और अविवेकी न बनो, और परमेश्वर में विश्वास को एक खेल की तरह न समझो। अपनी मंजिल के लिए, अपनी संभावनाओं के लिए, अपने जीवन के लिए विचार करो और अपने स्वयं के साथ ऊपरी तौर से दिलचस्पी न लो। क्या तुम इन वचनों को स्वीकार कर सकते हो?
— “जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, तब तक परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा” से उद्धृत
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हिंदी सुसमाचार संगीत संग्रह: परमेश्वर की उपस्थिति का स्वागत करने का तरीका खोजने के लिए सुसमाचार संगीत सुनें, और एक बुद्धिमान कुंवारी बनें जो प्रभु का स्वागत कर सकती हैं।