सम्पादक की टिप्पणी: प्रकाशितवाक्य के अध्याय 22 में प्रभु यीशु ने कई बार “मैं शीघ्र आनेवाला हूँ“, यह भविष्यवाणी की है। यह तो पक्का है कि प्रभु में विश्वास रखने वाले सभी भाई-बहन दिल से आशा करते हैं कि वे लौट कर आये प्रभु का स्वागत कर पाने में समर्थ हों और उनके साथ विवाह भोज में शामिल हों। तो, हमें ऐसा क्या करना चाहिए जिससे हम लौट कर आये प्रभु का स्वागत कर सकें? आगे पढ़िए और इस सवाल का जवाब जानिए।अधिक पढ़ें »
लेखक: lordjesusreturning
आओ सिय्योन में लेकर यशगान | Hindi Christian Song With Lyrics
आओ सिय्योन में लेकर यशगान।
पहले ही प्रकट हो चुका है परमेश्वर का धाम।
आओ सिय्योन में लेकर यशगान।
करते उसके पवित्र नाम का सब गुणगान; ये फैल रहा है।अधिक पढ़ें »
आपको पापों से छुटकारा दिया गया है, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि आपको परमेश्वर का अनंत उद्धार प्राप्त हो गया है?

परमेश्वर कहते हैं, “अंत के दिनों का कार्य वचनों को बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने पर इन लोगों में हुए परिवर्तन उन परिवर्तनों की अपेक्षा बहुत अधिक बड़े हैं जो चिन्हों और अद्भुत कामों को स्वीकार करने पर अनुग्रह के युग में लोगों पर हुए थे। क्योंकि, अनुग्रह के युग में, हाथ रखने और प्रार्थना से दुष्टात्माओं को मनुष्य से निकाला जाता था, परन्तु मनुष्य के भीतर का भ्रष्ट स्वभाव तब भी बना रहता था। अधिक पढ़ें »
परमेश्वर के दैनिक वचन | “परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III” | अंश 70
खोई हुई भेड़ का दृष्टान्त
(मत्ती 18:12-14) तुम क्या सोचते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानबे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को न ढूँढ़ेगा? और यदि ऐसा हो कि उसे पाए, तो मैं तुम से सच कहता हूँ कि वह उन निन्यानबे भेड़ों के लिये जो भटकी नहीं थीं, इतना आनन्द नहीं करेगा जितना कि इस भेड़ के लिये करेगा। ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।
यह एक रूपक है—इस अंश से लोग किस प्रकार का एहसास प्राप्त करते हैं? जिस तरह से इस अलंकार को प्रदर्शित किया गया है वह मानवीय भाषा में वाक्य अलंकार का उपयोग करता है; यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य के ज्ञान के दायरे के भीतर है। यदि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में ऐसा कुछ कहा होता, तो लोगों ने महसूस किया होता कि वास्तव में जो परमेश्वर है यह उस के अनुरूप नहीं था, लेकिन जब मनुष्य के पुत्र ने अनुग्रह के युग में इस अंश को प्रदान किया, तब इससे लोगों को सुकून, उत्साह, और घनिष्ठता मिली। जब परमेश्वर देहधारी हुआ, जब वह एक मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, तो उसने मानवता पर अपने हृदय की आवाज़ को प्रकट करने के लिए बिल्कुल उचित रूपक का उपयोग किया। यह आवाज़ परमेश्वर के स्वयं की आवाज़ का और उस कार्य का प्रतिनिधित्व करता है जो वह उस युग में करना चाहता था। अनुग्रह के युग के लोगों के प्रति परमेश्वर के जो रवैय्या था यह उसे भी दर्शाता था। लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोदृष्टि के नज़रिए से देखने से पता चलता है कि, उसने हर व्यक्ति की तुलना एक भेड़ से की है। यदि एक भेड़ खो जाती है, तो उसे खोजने के लिए जो कुछ हो सकता है वह करेगा। यह इस समय मनुष्यों के बीच परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत को देह में दर्शाता है। परमेश्वर ने इस कार्य में अपनी दृढ़ता और मनोवृत्ति की व्याख्या करने के लिए इस दृष्टान्त को प्रयोग किया था। यह परमेश्वर के देहधारण का लाभ थाः वह मानव जाति के ज्ञान का लाभ उठा सकता था और लोगों से बात करने, और अपनी इच्छा को प्रकट करने के लिए मानवीय भाषा का उपयोग कर सकता था। उसने मनुष्यों के लिए अपनी गहरी, और ईश्वरीय भाषा की व्याख्या की एवं अनुवाद किया जिसे मानवीय भाषा, और मानवीय तरीके से समझने में लोगों को संघर्ष करना पड़ता था। इस से लोगों को उस की इच्छा को समझने में और यह जानने में सहायता मिली कि वह क्या करना चाहता था। वह मानवीय भाषा का प्रयोग करके, मानवीय दृष्टिकोण से लोगों के साथ वार्तालाप कर सकता था, और साथ ही वह उस तरीके से लोगों से बातचीत कर सकता था जिसे वे समझ सकते थे। वह मानवीय भाषा और ज्ञान का उपयोग कर के बातचीत और काम कर सकता था जिस से लोग परमेश्वर की करूणा और नज़दीकी का एहसास कर सकते थे, जिस से वे उस के हृदय को देख सकते थे। तुम लोग इसमें क्या देखते हो? यह कि परमेश्वर के वचनों और क्रियाओं में कोई निषेधात्मकता नहीं थी। जिस तरह से लोग इसे देखते हैं, हो ही नहीं सकता था कि वह बात जो परमेश्वर स्वयं कहना चाहता था, और वह कार्य जो वह करना चाहता था उसके बारे में बात करने के लिए, या अपनी स्वयं की इच्छा को प्रकट करने के लिए परमेश्वर मनुष्यों के ज्ञान, भाषा, या बोलने के तरीकों का प्रयोग कर सकता था; यह एक त्रुटिपूर्ण सोच है। परमेश्वर ने इस प्रकार के अलंकार का प्रयोग किया जिस से लोग परमेश्वर की वास्तविकता और ईमानदारी का एहसास कर सकते हैं, और उस समय काल के दौरान लोगों के प्रति उसकी प्रवृत्ति को देख सकते हैं। इस दृष्टान्त ने उन लोगों को ख्वाब से जगा दिया था जो लम्बे समय से व्यवस्था के अधीन जीवन व्यतीत कर रहे थे, और इस ने अनुग्रह के युग में रहने वाले लोगों को भी पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेरित किया था। इस दृष्टान्त के अंश को पढ़ने से, लोग मानव जाति को बचाने हेतु परमेश्वर की सत्यनिष्ठा और उसके हृदय में मानव जाति के लिए जो बोझ है उसे जान सकते हैं।
आओ हम इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें: “ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।” क्या ये प्रभु यीशु के स्वयं के शब्द थे, या उसके स्वर्गीय पिता के शब्द थे? सतही तौर पर, ऐसा लगता है कि वह जो बात कर रहा है वह प्रभु यीशु है, परन्तु उसकी इच्छा प्रभु यीशु की इच्छा को प्रकट कर रहा है। इसीलिए उसने कहा थाः “ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।” उस समय लोग केवल स्वर्गीय पिता को ही परमेश्वर के रूप में पहचानते थे, और इस व्यक्ति को जिसे वे अपनी आँखों के सामने देखते थे उसे बस उसके द्वारा भेजा हुआ समझते थे, और यह कि वह स्वर्गीय पिता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। इसी लिए प्रभु यीशु को साथ ही साथ ऐसा कहना पड़ा था, ताकि वे सचमुच में मानव जाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को अनुभव कर सकें, और जो कुछ उसने कहा था उसकी प्रमाणिकता और सटीकता का एहसास कर सकें। भले ही यह कहने में एक साधारण बात थी, परन्तु यह बहुत ही ज़्यादा परवाह करने वाली बात थी और इस ने प्रभु यीशु की दीनता और रहस्य को प्रकाशित किया था। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि चाहे परमेश्वर ने देहधारण किया या उसने आध्यात्मिक क्षेत्र में काम किया, वह मनुष्य के हृदय को सब से बढ़कर जानता था, और सब से बढ़कर यह समझता था कि लोगों की जरूरतें क्या थीं, और जानता था कि लोगों को कौन सी चिंता सताती थी, और क्या उन्हें भ्रम में डालता था, इसलिए उसने इस पंक्ति को जोड़ दिया था। इस पंक्ति ने एक समस्या को उजागर किया जो मानव जाति में छुपी हुई थी। मनुष्य के पुत्र ने जो कुछ भी कहा था उसको लेकर लोग सन्देह में थे, ऐसा कहना चाहिए, जब प्रभु यीशु कह रहा था उसे यह जोड़ना पड़ा थाः “ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।” केवल इस पूर्वकथन पर ही उसके वचन फलवन्त हो सकते थे, ताकि उनकी सटीकता तथा उनकी विश्वसनीयता पर लोगों को विश्वास दिलाया जा सके। यह दिखाता है कि जब परमेश्वर मनुष्य का एक साधारण पुत्र बन गया, तब परमेश्वर और मनुष्य जाति का सम्बन्ध बड़ा अजीब सा था, और मनुष्य के पुत्र की स्थिति बहुत व्याकुल करने वाली थी। इस से यह भी दिखता था कि उस समय मनुष्यों के बीच में प्रभु की स्थिति कितनी महत्वहीन थी। जब उसने ऐसा कहा, तो यह वास्तव में लोगों को बताने के लिए थाः तुम लोग भरोसा कर सकते हो—यह उसे नहीं दर्शाता है जो स्वयं मेरे हृदय में है, परन्तु यह परमेश्वर की वह इच्छा है जो तुम लोगों के हृदय में है। मानव जाति के लिए, क्या यह एक हास्यास्पद बात नहीं थी? भले ही परमेश्वर देह में होकर काम कर रहा था और उसके पास अनेक फायदे थे जो उसके व्यक्तित्व में नहीं थे, फिर भी उसे उनके सन्देहों और तिरस्कार का सामना करना पड़ा था साथ ही उनकी स्तब्धता और मूढ़़ता का भी। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य के पुत्र के कार्य की प्रक्रिया मानव जाति के द्वारा तिरस्कृत किए जाने के अनुभव की प्रक्रिया, और मानव जाति के द्वारा उसके विरूद्ध प्रतिस्पर्धा किए जाने के अनुभव की प्रक्रिया थी। उस से बढ़कर, यह मानव जाति के भरोसे को निरन्तर जीतने और जो उस के पास है तथा जो वह है उसके द्वारा, और अपने स्वयं के सार के द्वारा मानव जाति पर विजय पाने के लिए काम करने की प्रक्रिया थी। वह इतना नहीं था कि देहधारी परमेश्वर ज़मीन पर शैतान के विरूद्ध युद्ध कर रहा था; यह उस से अधिक था कि परमेश्वर एक सामान्य मनुष्य बन गया और उनसे संघर्ष करना प्रारम्भ कर दिया जो उस का अनुसरण करते थे, और अपने संघर्ष में मनुष्य के पुत्र ने अपनी दीनता के साथ, जो उसके पास है तथा जो वह है उसके साथ, और अपने प्रेम और बुद्धि के साथ अपना कार्य पूर्ण किया था। उसने उन लोगों को हासिल किया जिन्हें वह चाहता था, उस पहचान और स्थिति को हासिल किया जिसके वह योग्य था, और अपने सिंहासन की ओर लौट गया।
— ‘परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III’ से उद्धृत
ईसा मसीह के उपदेश। आपको नई रोशनी देना। आपकी आत्मा को पोषण देना
अगर आप हर दिन बाइबल पढ़ने के बावजूद भी आत्मा को मुरझाते हुए पाते है! तो आप क्या कर सकते हैं? परमेश्वर के दैनिक वचन पर क्लिक करें या निम्नलिखित संबंधित सामग्री का आनंद लें। https://hi.bible-nl.org/category/christian-videos/daily-words-of-God-2
बाइबिल छंद: पश्चाताप और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश के बीच संबंध
प्रभु में विश्वासियों का मानना है कि वे प्रभु यीशु की क्षमादान और दया प्राप्त कर सकते हैं, और पापों की क्षमा तब तक प्राप्त कर सकते हैं जब तक वे अपने पापों को स्वीकार करने और ईमानदारी से पश्चाताप करने के लिए प्रभु के सामने आते हैं और उन्हें राज्य में पुन: प्राप्त किया जाएगा।अधिक पढ़ें »
परमेश्वर के प्रकटन की खोज कैसे करें

“यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं हैं, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है” (यशायाह 55:8-9)।
सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, “चूँकि हम परमेश्वर के पदचिह्नों की खोज कर रहे हैं, इसलिए यह हमें परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के वचनों, उसके कथनों को तलाशने के योग्य बनाता है—क्योंकि जहाँ कहीं भी परमेश्वर के द्वारा बोले गए नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है और जहाँ कहीं भी परमेश्वर के पदचिह्न हैं, वहाँ परमेश्वर के कर्म हैं। जहाँ कहीं भी परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर प्रकट होता है, और जहाँ कहीं भी परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य, मार्ग और जीवन विद्यमान होता है। परमेश्वर के पदचिह्नों की तलाश में, तुम लोगों ने उन वचनों की उपेक्षा कर दी है कि ‘परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है।’ और इसलिए, बहुत से लोग, सत्य को प्राप्त करके भी यह नहीं मानते हैं कि उन्हें परमेश्वर के पदचिह्न मिल गए हैं, और वे परमेश्वर के प्रकटन को तो और भी कम स्वीकार करते हैं। कितनी गंभीर ग़लती है! परमेश्वर के प्रकटन का मनुष्य की धारणाओं के साथ समन्वय नहीं किया जा सकता है, परमेश्वर मनुष्य के आदेश पर तो बिल्कुल प्रकट नहीं हो सकता। परमेश्वर जब अपना कार्य करता है, तो वह अपनी पसंद और अपनी योजनाएँ बनाता है; इसके अलावा, उसके अपने उद्देश्य और अपने तरीके हैं। वह जो भी कार्य करता है, उसे उसके बारे में मनुष्य से चर्चा करने या उसकी सलाह लेने की आवश्यकता नहीं है, वह अपने कार्य के बारे में किसी भी व्यक्ति को सूचित तो बिल्कुल नहीं करता। परमेश्वर के इस स्वभाव को हर व्यक्ति को पहचानना चाहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के प्रकटन को देखने, परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करने की इच्छा रखते हो, तो तुम लोगों को सबसे पहले अपनी धारणाओं को त्याग देना चाहिए। तुम लोगों को यह माँग करनी ही नहीं चाहिए कि परमेश्वर ऐसा या वैसा करे, तुम्हें उसे अपनी सीमाओं और अपनी अवधारणाओं तक सीमित नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, तुम्हें पूछना चाहिए कि तुम लोगों को परमेश्वर के पदचिह्नों की तलाश कैसे करनी है, तुम्हें परमेश्वर के प्रकटन को कैसे स्वीकार करना है, और तुम्हें परमेश्वर के नए कार्य के प्रति कैसे समर्पण करना है; मनुष्य को ऐसा ही करना चाहिए। चूँकि मनुष्य सत्य नहीं है, और सत्य को धारण नहीं करता है, इसलिए उसे खोजना, स्वीकार करना, और आज्ञापालन करना चाहिए” (“परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है”)।
स्रोत: यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए
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परमेश्वर वास्तव में मनुष्यों के बीच आ गया है

परमेश्वर कहते हैं, “मैंने तुम लोगों के बीच बहुत काम किया है और, निस्संदेह, बहुत से कथन भी कहे हैं। फिर भी मुझे महसूस होता है कि मेरे वचनों और कार्य ने अंत के दिनों में मेरे कार्य के उद्देश्य को अच्छी तरह से पूरा नहीं किया है। क्योंकि, अंत के दिनों में, मेरा कार्य किसी खास व्यक्ति या खास लोगों के वास्ते नहीं है, बल्कि मेरे अन्तर्निहित स्वभाव को प्रदर्शित करने के लिए है। लेकिन, असंख्य कारणों से—कदाचित् समय की कमी या कार्य की व्यस्तता के कारण—मेरे स्वभाव ने इंसान को इस योग्य नहीं बनाया कि वह मुझे ज़रा-सा भी जान सके। इसलिए अपने कार्य में एक नया पृष्ठ खोलने के लिए, मैं अपनी एक नयी योजना की ओर, अपने अंतिम कार्य में, कदम बढ़ाता हूँ ताकि वे सब जो मुझे देखते हैं, मेरे अस्तित्व के कारण लगातार अपनी छाती पीटेंगे और रोएँगे और विलाप करेंगे। क्योंकि मैं संसार में मनुष्यों का अंत कर दूँगा, और उसके बाद से, मैं मनुष्यों के सामने अपने पूरे स्वभाव को प्रकट करूंगा, ताकि वे सभी लोग जो मुझे जानते हैं, और जो नहीं जानते, अपनी आँखों को निहाल कर सकें और वे देखें कि मैं वास्तव में मनुष्यों के संसार में आ गया हूँ, पृथ्वी पर आ गया हूँ, जहाँ सभी चीज़ें बढ़ती रहती हैं। यह मेरी योजना है, यह मनुष्यों के सृजन के समय से मेरी एकमात्र ‘स्वीकारोक्ति’ है। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग अपना अखण्ड ध्यान मेरी प्रत्येक गतिविधि पर दो, क्योंकि मेरी छड़ी एक बार फिर लोगों पर प्रहार करती है, विशेष रूप से उन लोगों पर जो मेरा विरोध करते हैं” (“अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो”)।
स्रोत: यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए
प्रभु यीशु मसीह के बारे में जानकारी: उद्धारकर्ता यीशु जिस के लिए हम लंबे समय से तरस रहे थे, वह “सफेद बादल” पर आया है। क्या आपने उसका स्वागत किया है? यह पृष्ठ आपको परमेश्वर के पदचिन्हों पर चलने और उद्धारकर्ता की वापसी का स्वागत करने में मदद करेगा।
Hindi Christian Movie अंश 4 : “विजय गान” – प्रभु यीशु के दुबारा आने के लक्षण
Hindi Gospel Movie अंश 2 : “भक्ति का भेद” – जब प्रभु लौटेंगे तो क्या वे मनुष्यों को प्रकटन देंगे?
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कई धार्मिक पादरियों और एल्डर्स ने, क्योंकि उन्होंने कई वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास किया है, हमेशा परमेश्वर के लिए कड़ी मेहनत से कार्य किया है और प्रभु की वापसी की प्रतीक्षा करते हुए काफी सतर्क रहे हैं, उनका मानना है कि जब प्रभु आएंगे तो वे निश्चित रूप से उन्हें प्रकटन देंगे। अधिक पढ़ें »
Hindi Christian Movie अंश 2 : “स्वर्गिक राज्य की प्रजा” – अपने कपट का समाधान कैसे करें और ऐसा ईमानदार व्यक्ति कैसे बनें जो परमेश्वर को खुशी देता हो
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प्रभु यीशु ने कहा, “मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने नहीं पाओगे” (मत्ती 18:3)। (© BSI) चेंग नुओ एक ईसाई महिला है जो एक ईमानदार व्यक्ति बनने की कोशिश कभी नहीं छोड़ती है। कई सालों तक परमेश्वर के कार्य से गुजरने के बाद, वह पहले से कम झूठ बोलने लगी है और अहले सुबह से लेकर देर रात तक कलीसिया के लिए काम करती है। वह कष्ट उठाते हुए खुद को खपा रही है। वह अपने आपको एक ईमानदार महिला समझती है जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप काम करती है।अधिक पढ़ें »
परमेश्वर के प्रकटन की महत्ता

परमेश्वर कहते हैं, “परमेश्वर का प्रकटन व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करने के लिए उसके पृथ्वी पर आगमन का संकेत करता है। अपनी स्वयं की पहचान और स्वभाव के साथ, और उस तरीके से जो उसके लिए जन्मजात है, वह एक युग का आरंभ करने और एक युग को समाप्त करने के कार्य का संचालन करने के लिए मनुष्यजाति में अवरोहण करता है। इस तरह का प्रकटन किसी समारोह का रूप नहीं है। यह कोई संकेत, कोई तस्वीर, कोई चमत्कार या किसी प्रकार का भव्य दर्शन नहीं है, और यह किसी प्रकार की धार्मिक प्रक्रिया तो बिल्कुल नहीं है। यह एक असली और वास्तविक तथ्य है जिसे किसी के द्वारा भी छुआ और देखा जा सकता है। इस तरह का प्रकटन बेमन से किसी कार्य को करने के लिये, या अल्पकालिक उपक्रम के लिए नहीं है; बल्कि, यह उसकी प्रबंधन योजना में कार्य के एक चरण के वास्ते है। परमेश्वर का प्रकटन हमेशा सार्थक होता है और हमेशा उसकी प्रबंधन योजना से कुछ संबंध रखता है। यहाँ जिसे ‘प्रकटन’ कहा गया है, वह उस प्रकार के ‘प्रकटन’ से पूरी तरह से भिन्न है जिसमें परमेश्वर मनुष्य का मार्गदर्शन, अगुआई करता है और उसे प्रबुद्ध करता है। हर बार जब परमेश्वर स्वयं को प्रकट करता है तो वह अपने महान कार्य के एक चरण को कार्यान्वित करता है। यह कार्य किसी भी अन्य युग के कार्य से भिन्न होता है। यह मनुष्य के लिए अकल्पनीय है, और इसका मनुष्य द्वारा कभी भी अनुभव नहीं किया गया है। यह वह कार्य है जो एक नये युग का आरम्भ करता है और पुराने युग का समापन करता है, और यह मनुष्यजाति के उद्धार के कार्य का एक नया और बेहतर रूप है; इसके अलावा, यह वह कार्य है जो मनुष्यजाति को नए युग में लाता है। यही वह है जिसका संकेत परमेश्वर का प्रकटन करता है” (“परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है”)।
स्रोत: यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए
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Tai Chi Dance | New Heaven and New Earth “परमेश्वर के प्रकटन की महत्ता” (Hindi)